जानें गेहूं की खेती कैसे करें|1 min read

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गेहूँ रबी ऋतु में उगाई जाने वाली मुख्य अनाज की फसल है। अनाज के अलावा यह भूसे के रूप में अच्छा भोजन देता है। राज्य में लगभग 29 लाख हेक्टेयर भूमि पर गेहूं उगाया जाता है। पश्चिमी क्षेत्र में गेहूँ लगभग 10.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उगता है। लेकिन गेहूं की औसत उपज करीब 2900 किलो है। ग्राम प्रति हेक्टेयर। निम्नलिखित उन्नत तकनीकों का उपयोग करके औसत उपज को 25 से 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।

भारत में गेहूं की खेती (Wheat farming) रबी सीजन में की जाती है| भारत में गेहूं की खेती (Wheat farming) के प्रमुख राज्य पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश मुख्य हैं| भारत में गेहूं एक मुख्य फसल है, गेहूँ का करीब करीब 97 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है, गेहूं का प्रयोग मनुष्य अपने जीवन यापन हेतु मुख्यत रोटी के रूप में प्रयोग करते हैं, जिसमे प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पायी जाती है|

गेहूं की खेती कैसे करें उन्नत किस्मों का प्रयोग

उन्नत किस्में उच्च स्तर प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। गेहूं की किस्मों के बाद मकई को जोड़ा जा सकता है।

किस्मपकने की अवधि (दिनों में)औसत उपज (कु./है.)विशेषतायें
राज- 3077120 – 12245-50साधारण लवणीय भूमि के लिए उपयुक्त, रोली रोधक।
राज- 3765115 – 12040-45रोली रोधक, दाना सुनहरा एवं मोटा देरी से बुवाई में भी अच्छी पैदावार
डब्लू एच- 147130 – 14040-45देरी से बुवाई के लिएउपयुक्त, रोली रोधक।
पी बी डब्ल्यू – 373120 – 13040-45दाने बड़े, शरबती व हल्की दोमट भूमि के लिए उपयुक्त।
राज- 4037120 – 12545-50कल्ले काफी फूटते है। रोग रोधी, अधिक पैदावार।
राज- 1482120 – 13040-45अधिक दाने की उपज, रोग रोधी।
खारचिया- 65135 – 14530 – 35अधिक क्षारीय भूमि के लिए उपयुक्त, काली रोली रोधक, लाल रंग के दाने ।

जलवायु:-

गेहूं की खेती के लिए कम तापमान और कटाई के दौरान शुष्क और गर्म वातावरण की आवश्यकता होती है। इसलिए गेहूं की कटाई आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में की जाती है।

गेहूं की खेती के लिए भूमि एवं उसकी तैयारी

गेहूँ उगाने के लिए मिट्टी के उचित चयन की आवश्यकता होती है। गेहूं की खेती में अच्छी फसल उत्पादन के लिए मथियार भूमि को सबसे अच्छा माना जाता है। हालांकि हल्की मिट्टी में गेहूं लगाने से अच्छी फसल मिलेगी यदि पौधों को उचित मात्रा में निषेचित किया जाए और सही समय पर पानी दिया जाए। रोपण से पहले मिट्टी को अच्छी तरह से जुताई और ट्रैक्टर के साथ समतल किया जाना चाहिए।

गेहूं की खेती के लिए बीज दर एवं बुवाई

गेहूं के खेत में बीज बोने का सबसे अच्छा समय 15 नवंबर से 30 नवंबर तक है। 25 दिसंबर के बाद रोपण करने से उपज में 90 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिदिन की कमी आती है। बीज बोते समय कतार से कतार की दूरी 20 सेमी होनी चाहिए।

अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए सही फसल संख्या की आवश्यकता होती है। सामान्य दिनों में 100 किलो गेहूं बोया जाता है। एक हेक्टेयर बीज पर्याप्त है। फसल के मौसम के दौरान बीज का आकार 25 प्रतिशत तक बढ़ जाना चाहिए। गेहूं की बिजाई का सबसे अच्छा समय नवंबर के पहले से तीसरे सप्ताह तक है। 15 दिसंबर के अंत में बुवाई करें। गेहूं की नियमित बुवाई करनी चाहिए। यह आपकी पंक्ति की जगह को 225 से 25 सेमी भेजने के लिए पर्याप्त है। जितना हो सके भूसा दो और बोओ। खेत में खरपतवार कम होने के कारण फसल अच्छी तरह से कॉम्पैक्ट और अच्छी तरह से विकसित होती है।

गेहूं की खेती के लिए खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए उर्वरकों और रासायनिक उर्वरकों का सही मात्रा में उपयोग करना महत्वपूर्ण है। दो से तीन वर्षों के भीतर 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट के साथ खेत में लगाना चाहिए। 100 किलो गेहूं भी है। नाइट्रोजन तथा 60 किग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टेयर चाहिए। बुवाई के समय नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस की पूरी मात्रा का प्रयोग करें तथा उर्वरक की मात्रा 130.50 किग्रा. डी.ए.पी. और 58 किलो यूरिया। फिर आपको नाइट्रोजन की आधी मात्रा को दो बराबर भागों में बांटना होगा। बुवाई के बाद पहली और दूसरी सिंचाई के तुरंत बाद दवा का छिड़काव किया जाता है। गेहूं में भी जिंक की कमी पाई जाती है। इसके लिए आपको 25 किलो जिंक सल्फेट की जरूरत होगी। जमीन में बोने से पहले प्रति हेक्टेयर की मात्रा बताना जरूरी है लेकिन उससे पहले मिट्टी की जांच जरूरी है।

सिंचाई

गेहूं की फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए उचित अवस्था पर सिंचाई करनी महत्वपूर्ण होती है। प्रथम सिंचाई बुवाई के 20-25 दिन बाद करनी चाहिये। इस समय पौधे की शीर्ष जड़ें बनती हैं। यह बहुत की महत्वपूर्ण सिंचाई होती है। दूसरी सिंचाई बुवाई के 45-50 दिन बाद (फूटान के समय), तीसरी सिंचाई 60-65 दिन पश्चात् (गांठ बनते समय), चौथी सिंचाई 80-85 दिन बार (बाली आने पर), पाँचवी सिचांई 100-105 दिन बाद (दूधिया अवस्था पर) एवं अन्तिम सिंचाई 115 से 120 दिन बाद (दाना पकते समय) करनी चाहिये। अंतिम सिंचाई से दानों का पूर्ण विकास होता है। जहाँ तक संभव हो सके सिंचाई फव्वारे विधि द्वारा करनी चाहिये।

गेहूं की खेती के लिए खरपतवार नियंत्रण

गेहूं की फसल में चौडी एवं नुकीली पत्ती वाले अनेक खरपतवार जैसे गोयला, चील, पीली सैंजी, प्याजी, गुल्ली डंडा, जंगली जई इत्यादि नुकसान पहुँचाते है। फसल की बुवाई के दो दिन पश्चात् तक पेन्डीमैथालीन (स्टोम्प) नामक खरपतवार नाशी की बाजार में उपलब्ध 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव करना चाहिये। इसके उपरान्त फसल जब 30-35 दिन की हो जाये तो बाजार में उपलब्ध 2, 4-डी एस्टर साल्ट 72 ई सी की 1 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिये।

खेत में यदि गुल्ली डंडा, जंगली जई एवं फ्लेरिस माइनर की अधिक समस्या हो तो आइसाप्रोटूरोन की बाजार में उपलब्ध 2 किलो मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के 25-30 दिन पश्चात् छिड़काव कर देना चाहिये।

गेहूं की खेती के लिए पादप संरक्षण

दीमक :- दीमक गेहूँ के पौधो की जड़े काटकर फसल को बहुत हानि पहुचाँती है। दीमक की रोकथाम के लिए अंतिम जुताई के समय खेत में क्लोरोपाइरीफॉस या क्यूनालफॉस की 20-25 किग्रा. मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से भुरक कर मिट्टी में मिला देनी चाहिए। बीज को क्लोरोपायरीफोस की 2 मिली. मात्रा द्वारा प्रति किलो बीज दर से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त खड़ी फसल में क्लोरोपाइरीफोस कीट नाशक की 2 लीटर मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ देनी लाभदायक रहती है।

मोयला (एफीड) व जैसीडस :- ये कीट पत्तियों व पौधे की बालियों से रस चूसकर फसल को हानि पहुँचाते हैं। इनके नियंत्रण के लिए इमीडाक्लोरोप्रिड की आधा लीटर या मोनोक्रोटोफास की 1 लीटर या मैलाथियौन की एक लीटर या ऐसीफैट की 500 ग्राम या इकालक्स की एक लीटर मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव किया जा सकता है।

शूट फलाई :- यह कीट पौधे की नई पत्तियों से रस चूसती है इसके कारण पौधे की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं इस मक्खी की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास 36 एस एल की आधा लीटर या फोसोलोन 35 ई. सी. की 0.75 लीटर मात्रा 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देनी चाहिये।

भूरी मकड़ी व तेला :- भूरी मकड़ी का प्रकोप दिसम्बर में अधिक होता है। तथा इसके प्रौढ़ व शिशु पत्तियों से रस चूसते हैं तथा पत्तियों हल्के रंग की हो जाती हैं। बीज कम बनते हैं तथा छोटे आकार के रह जाते हैं। भूरी मकड़ी व तेला की रोकथाम के लिए डायमिथोएट 30 ई.सी. एक लीटर या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. या फार्मोथियोन 25 ई.सी. की एक लीटर मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देनी चाहिये।

चूहा नियंत्रण :- चूहे गेहूं की फसल को बहुत नुकसान पहुंचाते है। चूहों को नियंत्रित करने के लिए चूहों के बिलो में जिंक फास्फाइड का बना चुग्गा प्रयोग करके चूहों को नष्ट किया जा सकता है। एल्युमिनियम फास्फाइड की 1 ग्राम की गोली प्रति बिल में डालकर भी चूहों को समाप्त किया जा सकता है। अनाज भंडारित जगह पर ब्रोमेडियोलोन 0.005 प्रतिशत चुहानाशक टिकियों द्वारा चूहों को मारा जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे चूहा विष को बच्चों एवं पालतू जानवरों की पहुँच से दूर रखना चाहिये।

पीला/ काला रतुआ :- पीले रतुआ के कारण पत्तियों पर पीले रंग के छोटे – छोटे कतारों में फफोले बन जाते हैं। जबकि काले रतुआ द्वारा पत्तियों की डंठलो एवं तनों पर लाल भूरे से काले रंग के लम्बे धब्बे बन जाते हैं। इन रोगों के नियंत्रण के लिए रोग रोधी किस्में जैसे राज – 3077, राज – 1482 व राज – 3777 किस्मों की बुवाई करनी चाहिये । रोग के लक्षण प्रकट होते ही गंधक का पाउडर 25 किलो ग्राम प्रति हैक्टेयर का भुरकाव व 2 किलो मैन्कोजेब प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अन्तर से 2-3 छिड़काव करने चाहिये।

अनावृत कण्डुआ रोग :- इस रोग के कारण गेहूँ की बाली काले पाउडर के रूप में बदल जाती है। इस रोग के नियंत्रण के लिए 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम नामक फाइँदनाशक से प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित कर बोना चाहिये। रोग ग्रसित पौधों को उखाडकर जला देना चाहिये।

टुण्डु रोग :- इस रोग के कारण पौधों की बालियां छोटी तथा मोटी हो जाती हैं। इनमे दानों की जगह हरे रंग के विकृत आकृति की गेंगले बन जाती हैं तथा बाद में भूरे काले रंग के हो जाते है। ये गेंगले सूत्रक्रमी के अन्डों से भरी होती हैं पत्तियों एवं बालियों में एक पीले रंग का गोंद जैसा चिपचिपा पदार्थ निकलता है। इसके नियंत्रण के लिए बीज को 20: नमक के पानी के घोल से उपचारित कर साफ पानी से धोकर छाया में सुखाकर बोना चाहिये।

सूत्रकृमी की समस्या :- गेहूँ में सूत्रकृमी पौधे की जड़ों को हानि पहुचाँते हैं। पौधे की बढ़वार कम होती है तथा पौधा पीला पड़ जाता है। पौधे में फुटान कम होता है, बालिया कम बनती है तथा छोटी रह जाती है। इस रोग की रोकथाम के लिए उचित फसल चक्र अपनाना चाहिये। गेहूँ की जगह सरसों, चना इत्यादि फसले उगानी चाहिये। खेत में बुवाई से पहले 45 किग्रा. कार्बोफ्यूरोन 3 प्रतिशत कण प्रति हैक्टेयर की दर से 10 किलो यूरिया के साथ मिलाकर देना चाहिये।

गेहूं की फसल पाले से बचाव

जब पाले पड़ने की सम्भावना हो तो खेत में सिंचाई कर देनी चाहिये। फसल पर 1 लीटर पानी में एक मि.ली. तनु गन्धक का तेजाब (सल्फ्यूरिक अम्ल) मिलाकर छिड़काव कर देना चाहिये। खेत के चारों और धुंआ करना भी लाभ दायक रहता है।

फसल चक्र
राज्य के पश्चिमी भाग के सिंचित क्षेत्र में एक दो एवं तीन वर्षों के फसल चक्र प्रयोग किये जा सकते हैं।
1. मूंग/ग्वार/बाजरा – गेहूँ – एक वर्ष
2. मूंग-गेहूँ-बाजरा-सरसो- दो वर्ष
3. बाजरा-गेहूँ मूंग/ग्वार-सरसों/जीरा – दो वर्ष
4. बाजरा-गेहूँ मूंग/ग्वार-गेहूँ-बाजरा – सरसों (तीन वर्ष)

फसल चक्र द्वारा फसलों में खरपतवार, कीड़े एव बीमारियों की समस्या कम होती है। भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ती है तथा फसलों की पैदावार बढ़ती है। अतः फसल चक्र अपनाना आवश्यक है।

गेहूं बीज का उत्पादन

गेहूँ का बीज उत्पादन किसान स्वंय कर सकता है। तथा प्रत्येक वर्ष बाजार से बीज खरीदने की आवश्यकता नहीं होती । गेहूँ के बीज उत्पादन के लिए ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिये जिसमें पिछले वर्ष गेहूं की खेती न की गई हो तथा भूमि की उर्वरा शक्ति अच्छी होनी चाहिये । जल निकास की उचित व्यवस्था हो, खेत के चारों ओर 150 मीटर तक गेहूँ का अन्य खेत न हो, क्योंकि कन्डुआ रोग गेहूँ के एक खेत से दूसरे खेत में आसानी से फैल जाता हैं।

सामान्य स्थिति में 5 से10 मीटर पृथककरण दूरी पर्याप्त होती हैं। बीज उत्पादन हेतु प्रमुख कृषि क्रियाये तथा फसल सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिये। प्रमाणित बीज की बुवाई करनी चाहिये। तथा खत में खरपतवारों विशेष रूप से फेलेरिस माइनर व हिरनखुरी का ध्यान रखना चाहिये। खेत में अनावृत कण्डूवा से ग्रसित एक भी पौधा नहीं होना चाहिये। अवांछनीय पौधों को दिखाई देते ही निकाल देना चाहिये।

फसल की कटाई खेत के चारों तरफ 10 मीटर क्षेत्र छोडते हुए लाटा काटकर अलग जगह इक्ट्ठा करके सूखाना चाहिये। सूखने के पश्चात् दाना भूसे से थ्रेसर द्वारा अलग कर लिया जाता है। इस दाने को साफ करके ग्रेडिंग कर अच्छी प्रकार सुखा लेना चाहिये। दाने में 8-9 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं होनी चाहिये। बीज को फफूद नाशक एवं कीटनाशक से उपचारित कर लोहे की टंकी या साफ बोरे में भरकर सुरक्षित जगह भण्डारित कर लेना चाहिये । इस प्रकार उत्पन्न किये गये बीज की किसान अगले वर्ष बुवाई कर सकते है।

गेहूं की कटाई एवं गहाई

जब फसल के पौधे पीले पड़ जाये तथा दानों में नमी 15 प्रतिशत से अधिक न हो तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिये । लाटे को अच्छी प्रकार सुखाकर थ्रेसर द्वारा दाने को अलग कर लेना चाहिये तथा साफ कर सुखाकर कर बोरों में भर लेना चाहिये।

उपज एवं आर्थिक लाभ

उन्नत विधियों द्वारा खेती करने से गेहूँ की औसत दाने की उपज 40 से 45 कुंतल तथा भूसे की 50-55 क्विंटल प्रति हैक्टेयर प्राप्त हो जाती है। गेहूँ की एक हैक्टेयर खेती करने पर लगभग 30 हजार रूपयो का खर्च आ जाता है। यदि गेहूँ का भाव 12 रूपये प्रति किग्रा. तथा भूसे का भाव 2 रूपये प्रति किलो हो तो प्रति हैक्टेयर 28 से 30 हजार का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

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