लीची की खेती कब और कैसे करे Litchi ki kheti kaise kare1 min read

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लीची एक रसदार और स्वादिष्ट फल है जो दक्षिणी चीन में उत्पन्न हुआ और धीरे-धीरे दुनिया भर में फैल गया। उसके दोनों नाम लीची हैं। लीची फल आमतौर पर ताजा या पेय के रूप में खाया जाता है। उन्हें कैल्शियम फास्फोरस और राइबोफ्लेविन (विटामिन) का उच्च स्रोत माना जाता है। फल दुनिया के कई हिस्सों में उगते हैं लेकिन चीन और भारत सबसे बड़े उत्पादक हैं। लीची के पौधों का बीज जीवन बहुत कम मिट्टी का होता है और उचित वृद्धि के लिए उचित जलवायु परिस्थितियों की आवश्यकता होती है।

लीची न केवल भारत में बल्कि अपने आकर्षक स्वाद और रंग गुणवत्ता के कारण दुनिया में एक अद्वितीय स्थान रखती है। भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फल उत्पादक देश है। पिछले कुछ वर्षों में निर्यात क्षमता तेजी से बढ़ी है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़े आकार और उच्च गुणवत्ता वाले फलों की काफी मांग है। इसलिए उच्च गुणवत्ता वाले फलों के उत्पादन पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। कृषि के लिए एक विशिष्ट जलवायु की आवश्यकता होती है और इसे कहीं भी उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

लीची का फल बीमार और बुजुर्ग दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है। लीची का फल ज्यादातर ताजा ही खाया जाता है। फल का उपयोग विभिन्न संरक्षक जैसे पेय सॉस (कार्बोनेटेड पेय अमृत सिरप) और डिब्बाबंद फल बनाने के लिए किया जाता है। लोंगन सिरप अपने स्वाद और सुगंध के कारण बहुत लोकप्रिय है। लोंगन नट्स सूखे मेवों से बनाए जाते हैं। ताजा लीची भारत में मई से जुलाई तक उपलब्ध होगी जिसे विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात किया जा सकता है।

लीची की खेती के लिए अनुकूल भूमि का चयन

लीची की बागवानी के लिए सामान्य मिट्टी पीएच वाली दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है। उत्तरी भारत की चूना पत्थर मिट्टी जो अपनी उच्च जल क्षमता को बरकरार रखती है कृषि के लिए आदर्श मानी जाती है। लीची भी उपयोगी रूप से उगाई जाती है और साइट्रस में छिपी होती है। पौधों की वृद्धि और फलों का उत्पादन अच्छा होता है जल धारण क्षमता अधिक होती है और मिट्टी उपजाऊ होती है। अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी वाले क्षेत्र जलभृत के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।

लीची की खेती की पूरी जानकारी

उन्नत किस्में

अगेती किस्में- शाही, त्रिकोलिया, अझौली, ग्रीन और देशी प्रमुख है, जो 15 से 30 मई के आसपास पककर तैयार हो जाती है|

मध्यम किस्में- रोज सेन्टेड, डी-रोज, अर्ली बेदाना और स्वर्ण रूपा प्रमुख है, जो 1 से 20 जून के आसपास पककर तैयार हो जाती है|

पछेती किस्में- चाइना, पूर्वी और कसबा प्रमुख है, जो 10 से 25 जून के आसपास पककर तैयार हो जाती है|

प्रवर्धन तकनीक

व्यावसायिक लीची की खेती के लिए गुटी विधि से उगाए गए पौधों का ही उपयोग किया जा सकता है। पौध की खराब गुणवत्ता के कारण यह उच्च गुणवत्ता वाले फल नहीं देता है और फलों के सेट में देरी होती है। स्वस्थ सीधी शाखाओं का चयन करने के बाद मई से जून तक चिपचिपा पौधे तैयार करने के लिए शाखा के शीर्ष से 40 से 50 सेमी नीचे नोड के पास 2 सेमी चौड़ा एक चक्र बनाएं। रिंग के ऊपरी सिरे पर 2000 पीपीएम आईबीए पेस्ट लगाएं। रिंग को गीले काई से ढंकना चाहिए और सफेद नंबर वाली पॉलिथीन शीट से लपेटना चाहिए। 400 को रुई से कसकर बांधा गया था। लगाव के बाद लगभग दो महीने में जड़ें पूरी तरह से विकसित हो जाती हैं। इसलिए वर्तमान में मुख्य पौधे की लगभग आधी शाखाओं और पत्तियों को उखाड़ कर नर्सरी के छायांकित हिस्से में प्रत्यारोपित किया जाता है। स्फाग्नम मॉस के विकल्प के रूप में तालाब की मिट्टी के अपघटन (40 किग्रा) अरंडी की खली (2 किग्रा) और यूरिया (200 ग्राम) का मिश्रण भी इस्तेमाल किया जा सकता है। एक बार जब पूरा मिश्रण अच्छी तरह मिक्स हो जाए और थोड़ा गीला हो जाए तो इसे एक जगह ढककर 15 से 20 दिनों के लिए बर्लेप या पॉलिथीन बैग से ढक दें। छोटी छोटी लोइयां (200 ग्राम) बना लें और उन्हें रिंग में रखकर पॉलिथीन से बांध दें।

पौधा रोपण

उगाए गए लीची के पेड़ बड़े होते हैं। फिर इसे 10 x 10 मीटर की औसत दूरी पर बोना चाहिए। गंगाजल लगाने से पहले खेत में एक खेत बनाकर रोपण क्षेत्र का निरीक्षण करें। फिर अप्रैल से मई तक 90 x 90 x 90 सेमी का छेद खोदें। 20 ग्राम टमाटर – 10 ग्राम गड्ढे की ऊपरी परत में। छेद को मिश्रण से भरना चाहिए। 10 से 15 सेमी ऊंचे खेत में गड्ढों को 10 से 15 सेमी की गहराई तक भरा जाना चाहिए। रोपण के बाद मिट्टी को अच्छी तरह से ढक दें और बगीचे के चारों ओर एक बैग रखें और 2 से 3 बाल्टी (25 से 30 लीटर) पानी डालें। उसके बाद अगर बारिश नहीं होती है तो पेड़ के पूरी तरह से बढ़ने तक पानी देना जारी रखना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

पहले 2 से 3 साल तक लीची के पौधे को 30 किलो खाद गोबर 2 किलो किशमिश की खली 250 ग्राम यूरिया 150 ग्राम फॉस्फेट और 100 ग्राम लीन पोटेशियम क्लोराइड खिलाना चाहिए। फिर घास के बढ़ने के साथ उर्वरक की मात्रा बढ़ती जाती है। गुणवत्ता और फल लोंगान फल क्रैनबेरी केक और कम्पोस्ट की मदद से उगाया जाता है। दो तिहाई फास्फोरस और पोटेशियम उर्वरकों को अधिक उत्पादक और स्वस्थ अंकुर वृद्धि के लिए काटा जाता है ताकि अगले साल लीची के पौधे से फल लेने पर नए अंकुर पक सकें। जून से जुलाई तक प्लग और पेड़ पर खरोंच के साथ। परिपक्व पौधों के तनों से 200 से 250 सेमी तक देखा जाता है कि वे वृत्त को 60 सेमी गहरे मिट्टी के मिश्रण से भर देते हैं। इस प्रक्रिया से नई जड़ वाली फसलों की संतुष्टि होती है और खाद और उपजाऊ मिट्टी का पूर्ण उपयोग होता है: निषेचन के बाद बारिश न होने पर पानी देना आवश्यक है। लीची के पौधे को उखाड़ने के तुरंत बाद खाद डालने से मूंगों और फलों के पौधों की सफल वृद्धि में मदद मिलती है। मटर के आकार की फसल का उत्पादन करते समय पौधों की वृद्धि के दौरान सिंचाई के साथ शेष नाइट्रोजन की तीसरी मात्रा प्रदान की जानी चाहिए। जिंक की कमी के लक्षण वाले बगीचों में जिंक सल्फेट प्रति 150 से 200 ग्राम डालना उपयोगी हो सकता है। अन्य पौधों के साथ सितंबर में पेड़।

सिंचाई एवं जल संरक्षण

छोटे लीची के पौधों को बनने पर नियमित रूप से पानी देने की आवश्यकता होती है। इसके लिए सर्दियों में 5 से 6 दिन और गर्मियों में 3 से 4 दिन में पानी देना चाहिए। तरल पेड़ जो बड़े हो गए हैं और फल देने लगे हैं उन्हें फूल आने से पहले (नवंबर से फरवरी) 3 से 4 महीने तक पानी नहीं देना चाहिए। लीची के पौधों में फल पकने से छह सप्ताह पहले (अप्रैल की शुरुआत) शुरू हो जाते हैं। इसलिए इस समय बागों में उचित जल प्रबंधन और सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसलिए उचित जल प्रबंधन से स्वस्थ लुगदी विकास हो सकता है और फलों के टूटने का खतरा कम हो सकता है। लगाए गए पौधों में मधुमक्खियों के नीचे एक छोटा सा स्रोत रखकर लगातार नमी बनाए रखी जा सकती है। रात को बगीचे में पानी डालने से सब्जियों का पूरा उपयोग हो जाता है। लीची एक ड्रिप सिंचाई प्रणाली प्रदान करके समृद्ध होती है जो हर सुबह और शाम चार घंटे (40 से 50) लीटर पानी प्रदान करती है और उत्पादन की सफलता के लिए लगातार नमी बनाए रखना आवश्यक है। धरती। इसके लिए जरूरी है कि जल को प्रदूषित कर जल संरक्षण किया जाए। पौधे के मुख्य तने के चारों ओर सूखे खरपतवार या चावल के भूसे को लगाकर भूजल को संरक्षित किया जा सकता है। मिट्टी की भौतिक स्थिति में सुधार करता है और निराई और फसल के लिए अच्छा है।

देखभाल एवं काट-छाँट

लीची के पौधे लगाने के पश्चात् शुरूआत के 3 से 4 वर्षों तक समुचित देख-रेख करने की आवश्यकता पड़ती है| खासतौर से ग्रीष्म ऋतु में तेज गर्म हवा (लू) एवं शीत ऋतु में पाले से बचाव के लिए कारगर प्रबन्ध करना चाहिए| प्रारम्भ के 3 से 4 वर्षों में पौधों की अवांछित शाखाओं को निकाल देना चाहिए जिससे मुख्य तने का उचित विकास हो सके| तत्पश्चात् चारों दिशाओं में 3 से 4 मुख्य शाखाओं को विकसित होने देना चाहिए जिससे वृक्ष का आकार सुडौल, ढांचा मजबूत एवं फलन अच्छी आती है|

लीची के फल देने वाले पौधों में प्रतिवर्ष अच्छी उपज के लिए फल तोड़ाई के समय 15 से 20 सेंटीमीटर डाली सहित तोड़ने से उनमें अगले वर्ष अच्छे कल्ले निकलते हैं तथा उपज में वृद्धि होती है| पूर्ण विकसित पौधों में शाखाओं के घने होने के कारण पौधों के आन्तरिक भाग में सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँच पाता है, जिससे अनेक कीटों एवं बीमारियों का प्रकोप देखा गया है| अध्ययन में यह भी देखा गया है, कि लीची के पौधों में अधिकतम फलन नीचे के एक तिहाई छत्रक से होती है और वृक्ष के ऊपरी दो तिहाई भाग से अपेक्षाकृत कम उपज प्राप्त होती है|

अतः पूर्ण विकसित पौधों के बीच की शाखाएँ जिनका विकास सीधा ऊपर के तरफ हो रहा है, को काट देने से उपज में बिना किसी क्षति के पौधों के अन्दर धूप एवं रोशनी का आवागमन बढ़ाया जा सकता है| ऐसा करने से तना वेधक कीड़ों का प्रकोप कम होता है तथा पौधों के अन्दर के तरफ भी फलन आती है| फल तोड़ाई के पश्चात् सूखी, रोगग्रसित अथवा कैंची से शाखाओं को काट देना चाहिए| पौधों की समुचित देख-रेख, गुड़ाई तथा कीड़े एवं बीमारियों से रक्षा करने से पौधों का विकास अच्छा होता है एवं उपज बढ़ती है|

पूरक पौधे एवं अन्तरशस्यन

लीची के वृक्ष के पूर्ण रूप से तैयार होने में लगभग 15 से 16 वर्ष का समय लगता है| अतः प्रारम्भिक अवस्था में लीची के पौधों के बीच की खाली पड़ी जमीन का सदुपयोग अन्य फलदार पौधों एवं दलहनी फसलों या सब्जियों को लगाकर किया जा सकता है| इससे किसान भाइयों को अतिरिक्त लाभ के साथ-साथ मृदा की उर्वरा शक्ति का भी विकास होता है| शोध कार्यों से यह पता चला है, कि लीची में पूरक पौधों के रूप में अमरूद, शरीफा एवं पपीता जैसे फलदार वृक्ष लगाए जा सकते हैं|

ये पौधे लीची के दो पौधों के बीच में रेखांकित करके 5 x 5 मीटर की दूरी पर लगाने चाहिए| इस प्रकार एक हेक्टेयर जमीन में लीची के 100 पौधे तथा 300 पूरक पौधे लगाए जा सकते हैं| अन्तशस्य के रूप में दलहनी, तिलहनी एवं अन्य फसलें जैसे बोदी, फ्रेंचबीन, भिण्डी, मूंग, कुल्थी, सरगुजा, मडुआ एवं धान आदि की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है|

पुष्पन एवं फलन

चार से छह साल के बाद गोटी के लिए तैयार लीची के पौधे अंकुरित होकर बढ़ने लगते हैं। प्रयोग से स्पष्ट है कि फूलों की अपेक्षित अवधि से तीन महीने पहले जब पौधों ने सिंचाई करना बंद कर दिया तो स्थिति बहुत अच्छी थी। लिथियम पौधों में तीन प्रकार के फूल होते हैं। शुद्ध नर फूल पहले आते हैं। मादा फूल आने से पहले ही आ जाती है। इसलिए इसका प्रयोग पराग के लिए नहीं करना चाहिए। नर फूल तनों में समृद्ध होते हैं और अविकसित अंडाशय मादा फूलों से जुड़े होते हैं। ये नर फूल मधुमक्खियों से संक्रमित होते हैं। लीची का फल दोनों मादा फूलों पर ही उगता है। इन फूलों में अंडे के नीचे तना होता है इसलिए खुद को कमजोर करने के बजाय कीट पराग तैयार करना आवश्यक है। इसलिए अधिक फल पैदा करने के लिए वे मादा फूलों को ठीक से निषेचित नहीं करते हैं और पराग के दौरान कीटनाशकों का छिड़काव नहीं करते हैं क्योंकि इससे फल की स्थिति प्रभावित होगी।

समस्याएँ एवं निदान

फलों का फटना- फल विकसित होने के समय भूमि में नमी तथा तेज गर्म हवाओं से फल अधिक फटते हैं| यह समरूप फल विकास की द्वितीय अवस्था (अप्रैल के तृतीय सप्ताह) में आती है| जिसका सीधा संबंध भूमि में जल स्तर तथा नमी धारण करने की क्षमता से है| सामान्य तौर पर जल्दी पकने वाली किस्मों में फल चटखन की समस्या देर से पकने वाली किस्मों की अपेक्षा अधिक पायी जाती है|

इसके निराकरण के लिए वायु रोधी वृक्षों को बाग के चारों तरफ लगाएँ तथा अक्टूबर माह में पौधों के नीचे मल्चिंग करें| मृदा में नमी बनाए रखने के लिए अप्रैल के प्रथम सप्ताह से फलों के पकने एवं उनकी तोडाई तक बाग की हल्की सिंचाई करें और पौधों पर जल छिड़काव करें|

परीक्षणों से यह निष्कर्ष निकाला गया है, कि पानी के उचित प्रबन्ध के साथ-साथ फल लगने के 15 दिनों के बाद से 15 दिनों के अन्तराल पर पौधों पर बोरेक्स (5 ग्राम प्रति लीटर) या बोरिक अम्ल (4 ग्राम प्रति लीटर) के घोल का 2 से 3 छिड़काव करने से फलों के फटने की समस्या कम हो जाती है एवं पैदावार अच्छी होती है|

फलों का झड़ना- भूमि में नेत्रजन एवं पानी की कमी तथा गर्म एवं तेज हवाओं के कारण लीची के फल छोटी अवस्था में ही झड़ने लगते हैं| खाद एवं जल की उचित व्यवस्था करने से फल झड़ने की समस्या नहीं आती है| फल लगने के एक सप्ताह पश्चात् प्लैनोफिक्स (2 मिलीलीटर प्रति 4.8 लीटर) या एन ए ए (20 मिलीग्राम प्रति लीटर) पानी के घोल का एक छिड़काव करने से फलों को झड़ने से बचाया जा सकता है|

कीट रोकथाम

फल छेदक- यह फल के ऊपर वाले छिल्के से भोजन लेता है और फल को नुकसान पहुंचाता है| छोटे-छोटे बारीक छेद फलों के ऊपर देखने को मिलते हैं| रोकथाम हेतु बाग को साफ रखें, प्रभावित और गिरते हुए फल को दूर ले जाकर नष्ट कर दें| इसके साथ साथ निंबीसाइडिन 50 ग्राम + साइपरमैथरिन 25 ई सी 10 मिलीलीटर और डाइक्लोरवास 20 मिलीलीटर को प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर फल बनने के समय और रंग बनने के समय छिड़काव करें, 7 से 10 दिनों के फासले पर दोबारा छिड़काव करें| फल बनने के समय डाइफलूबैनज़िओरॉन 25 डब्लयु पी 2 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से छिड़काव करें|

पत्तों का सुरंगी कीट- इसका प्रभाव दिखाई देने पर प्रभावित पत्तों को तोड़ देना चाहिए| डाइमैथोएट 30 ई सी 200 मिलीलीटर या इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 60 मिलीलीटर को 150 लीटर पानी में मिलाकर फल लगने के समय छिड़काव करें, 10 से 15 दिनों के अंतराल पर फिर दोहराएं|

जूं- यह लीची की फसल को लगने वाला अत्यधिक नुकसानी कीड़ा है| इसका लार्वा और कीड़ा पत्तों के नीचे की तरफ और तने आदि का रस चूस लेता है| इसका शिकार हुए पीले और पत्ते मुड़ने शुरू हो जाते हैं और बाद में झड़ कर गिर पड़ते हैं| इसकी रोकथाम के लिए प्रभावित हिस्सों की छंटाई करके उन्हें नष्ट कर देना चाहिए| इसके साथ साथ डीकोफोल 17.8 ई सी 3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर 7 दिनों के फासले के दौरान छिड़काव करें|

रोग रोकथाम

पौधों का सूखना और जड़ गलन- लीची की खेती में इस बीमारी के कारण पौधे की 1 या 2 टहनियां या सारा पौधा सूखना शुरू हो जाता है| यदि इस बीमारी का इलाज जल्दी नहीं किया जाए तो जड़ गलन की बीमारी वृक्ष को बहुत तेजी से सुखा देती है| रोकथाम हेतु नए बाग लगाने से पहले खेत को साफ करें और पुरानी फसल की जड़ों को खेत में से बाहर निकाल दें पौधे के आस-पास पानी खड़ा ना होने दें और सही जल निकास का ढंग अपनाएं| पौधे की छंटाई करें और फालतू टहनियों को काट दें|

एंथ्राक्नोस- इस रोग के कारण चॉकलेटी रंग के बेढंगे आकार के पत्तों, टहनियों, फूलों और फलों के ऊपर धब्बे नज़र आते हैं| फालतू टहनियों को हटा दें और पौधे की अच्छे ढंग से छंटाई कर लें| फरवरी के महीने में बोर्डीऑक्स का छिड़काव करें, अप्रैल और अक्तूबर के महीने में कैप्टान डब्लयुपी 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें|

सफेद धब्बे- इस रोग के कारण पत्तों, फूलों और कच्चे फलों के ऊपर सफेद धब्बों के साथ भूरे दाग नज़र आते हैं| इससे पके हुए फलों को भी नुकसान होता है| दिन के समय ज्यादा तापमान और रात के समय कम तापमान, ज्यादा नमी और लगातार बारिश का पड़ना इस बीमारी के फैलने का कारण होता है| रोकथाम हेतु कटाई के बाद बाग की अच्छी तरह से सफाई करें| सर्दियों में इस बीमारी से बचने के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की छिड़काव करें| 

पैदावार

लीची के फूल जनवरी से फरवरी तक पौधे पर दिखाई देते हैं और फल मई से जून तक पकने के लिए तैयार होते हैं। फल गहरे गुलाबी रंग के होते हैं और उन पर एक छोटा सा धब्बा होता है। लीची के पौधे का फल प्रारंभिक अवस्था में कम हो जाता है। लेकिन फल के रूप में फल और पौध की मात्रा के संदर्भ में। वयस्क लीची के पौधे 15 से 20 वर्षों में औसतन 2 से 3/50 फल दे सकते हैं।

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